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Tuesday, 8 October 2019

विजयादशमी संकल्प - अध्यत्मता से अवगुणों का त्याग

 अध्यत्मता हमारी सभी धर्म और जाती की आत्मा है.हिंदू धर्म में तो अध्यम को अनन्य साधारण महत्व है. अध्यत्मता अवगुणों त्याग किया जा सकता है. किसी भी ग्रंथ मे जो बाते लिखी होती है,बताई गई होती है वह हमारे पूरे जिवनकाल मे किसी भी मसले मे बहोत महत्वपूर्ण साबित होती है.
  पिछले साल मैने विजयादशमी ( दश इंद्रियों पर विजय पाना) ये पोष्ट लिखी थी.जिस मे मैने लिखा था कैसे हम एक क्षण मे राम है तो दुसरे क्षण मे रावण है.अपनी बुरी आदतें और बुरे विचारों के बारे मे लिखा था.
  आज मै आपको महाभारत के दो कथाऐ बताऊंगा जो कि आप भलेभांती जानते हो.वैसे महाभारत बहोत सारी कथाओं का गुलदस्ता है और हर एक कथा अपने आप मे श्रेष्ठ है.हर कथा हमारे जिवन को प्रभावित करती है,हमे बुरे कर्मो से,बुरे विचारों से लढने का तरीका बताती है.
                                                                         
 Vijayadashmi Sankalp adhyatmata se avagun tyag.
जरासंध वध - हम सभी ये कथा जानते है की भीम ने जरासंध का वध कर रहा था तो वो वापस जुड जाता था. वो मर ही नही रहा था. तभी भीम श्रीकृष्ण की और देखते है,श्रीकृष्ण इशारा करते है की जरासंध को चिरकर अलग दिशा मे फेंके. भीम वही करते है और इस तरह जरासंध की मृत्यु हो जाती है.
   अब ये कथा हमारे जिवन मे कैसे प्रभाव डालती है ये देखते है.मान लो किसी को शराब पिने की आदत है उस शराब की वजह से वो कर्जे मे डूब जाता है, घर परीवार बिखर जाता है, लफडे झगडे होते है वो अलग इक समय आता है जब उस इंसान को ये समज आता है की ये सब शराब की वजह से होता है. वो ठाण भी लेता है की कल से वो शराब नही पियेगा. वो कसम भी खाता है की वो कल से शराब नही पियेगा. लेकिन उसकी ये कसम बस इक दो दिन ज्यादा से ज्यादा इक महिना चलती है बाद मे इक दिन  पी ही लेता है.तो समजो बुरी विचारोंवाला जरासंध फिर से जुड गया.
  इसी तरह तंबाखू गुटका खानेवाले,चोरी करनेवाले,औरतबाजी करनेवाले लोग,किसी की घृणा करनेवाले लोग कोई भी बुरी आदत रखनेवाले लोग सब की सभी की यही दशा होती है. बुरी विचारों और बुरी आदतोंवाला जरासंध फिर से जुड जाता है.
  अब इसके लिए उपाय क्या है? तो उपाय है. श्रीकृष्ण ने भीम को जरासंध को चिरकर विरोधी दिशा मे डालने को कहा था. हमे भी यही करना है. उल्टा ही करना है.यहा हम शराबी का उदाहरण लेते है.शराब लेनी की पॅक बनाने का इक बार उसे देखकर उसे बिना पिये फेंक देने की.थोडे दिन बहोत कठिण होगा करने मे पर धिरे धिरे हो जायेगा और इस तरह आदमी की शराब कि बुरी लत छुट जायेगी.ये दिखता है उतना आसान नही है, आखिरकार आप स्वयं भीम बनकर जरासंध का वध कर रहे हो. मन को कठोर बनाकर आप को ये करना पडेगा.इसी तरह गुटखा फोडने का लेकिन खाने का नही,फेकने का.इसी थीअरी प्रयोग आप हर बुरी लत के लिए कर सकते हो.
  कहानी यही खतम नही होती. जरासंध ( अपनी बुरी आदतें ) फिर से जुड जाती है. कैसे? इसके लिए मै और इक कहानी सुनाता हूं.
 राजा परिक्षित की कहानी.
 राजा परिक्षित की कहानी तो आप सभी जानते हो. राजा परिक्षित पांडवो के वंशज थे.राजा बहोत ही सुस्वभावी तथा शालीन  तथा अध्यत्मिक व्यक्ती थे.अपने प्रजा का बहोत खयाल रखते थे.इक दिन उन्होंने अपने पूर्वज पांडवो के बनाये तहखाना खोलने का निश्चय किया जो की सालो से बंद था जहा पर युद्ध मे उपयोग हुए औजार तथा मृत और घायल व्यक्ती की चिजे रखी थी.जहा पे उन्हे इक मुकूट बहोत पसंद आया वो पहनकर वो जंगल मे शिकार करने निकल गये.जहा उन्हे कुछ ऋषी मुनी तप करते हुए नजर आये.राजा परिक्षित को प्यास लगी थी सो उन्होंने उन ऋषीयों के पास पाणी मांगा.लेकिन तप मे लिन वो ऋषी राजा की बात सुन न पाये सो राजा को गुस्सा आया राजा ने इक मरा हुआ साप ऋषी के गले मे डालकर वहा से चल दिए. जब ऋषी तप मे से जागे उन्होंने अंतरज्ञान से जान लिया की ये किसने किया ऋषी ने श्राप दे दिया की जिसने भी ये किया है,उसकी सात दिन मे साप काटकर मृत्यू होगी और इसी प्रकार राजा की मृत्यू हो गयी. ये कहानी हम सब जानते है.
  राजा परिक्षित एक अच्छे मन के व्यक्ती थे.तो उन्होंने ऐसा दुष्कर्म कैसे किया? क्यों की उन्होंने जो मुकूट पहना था वो जरासंध का था, जरासंध था ही कुविचारी.जैसे ही उन्होंने वो मुकूट पहना जरासंध के कुविचार राजा के दिमाग मे आ गये.जैसे ही राजा ने वो मुकूट उतारा उनको अपने कर्म पर बहोत पश्चाताप हुआ.ये भी एक निती थी क्यों की उस वक्त द्वापारयुग खत्म हो के कलीयुग का प्रारंभ था. कली का प्रवेश कणक से होनेवाला तो हो गया.
 ऐसा हमारे निजी जिवन मे भी होता है.कई बार हम शराब पिने की बुरी आदत छोड देते है.लेकिन तभी हमे कोई पुराना दोस्त मिल जाता है,वो हमे पिने के लिए जबरदस्ती करता है.उसका दिल रखने के लिए हम इक बार पी भी लेते है.लेकिन वो लत बाद मे हमे चिपक जाती है. तब समज लेना वो आपका दोस्त आपको जरासंध का मुकूट पहनाने आया है.इस तरह छुटी हुई गलत आदते आपको किसी ना किसी तरह चिपक जाती है.
  हिंदू धर्म के ग्रंथ बुरी आदतो से छुटकारा पाने का तथा अच्छे कर्म करने सटीक मार्ग बताते है,जिवन का सार बताते है.बस  सही मतलब समज मे आना चाहिए.
  लेकिन आज भौतिक सुखों के पिछे भागकर इंसान खुद अपनी अधोगती का मार्ग चुनता है. हम हमेशा सुनते रहते है यहा खून, वहा आत्महत्या, यहा डाका, वहा बलात्कार ये सब हमारे धर्मग्रंथों के गलत मतलब निकालने का नतिजा है.
  जब मै यह पोष्ट लिख रहा था तब what's up पे मुझे एक मेसेज आया वो इस प्रकार था.
    गिता अध्याय  9 श्लोक नं. 20.
   त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा
   यज्ञरिष्ट् वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
   ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकम
अश्नान्ती दिव्यान्दिवि देवभोगन्।
 और निचे लिखा था की, देखो सोमरस ( दारू ) पिने से इंसान को स्वर्ग की प्राप्ती होती है.
  अब इंसान को क्या बोले? इंसान अपने मतलब का अर्थ बराबर निकाल लेता है वो भी भगवत गिता जैसे महान ग्रंथ से जो की वेदों का सार है.इसलिए तो इसान का पतन होता है.
  उस श्लोक का अर्थ है, जो लोग सकाम कर्म करते है, सोमरस का पान करते है,वो पापों से शुद्ध होकर यज्ञ करके मेरी पूजा करते है वो स्वर्ग की प्राप्ती कर के देवलोक के सुख प्राप्त करते है.
  यहा सोमरस का अर्थ है, सोम याने इश्वर और रस याने भक्ती.सोमरस याने इश्वरभक्ती. लोग सोमरस को दारू समजते है.
  satvichar.com का हमेशा अच्छे विचार लोगो तक पहूंचाने का प्रयास करता है, इसलिए वाचकों की आशिर्वाद की जरूरत है. गलती हम से भी हो सकती है. अगर कोई गलती हो जाय हमे क्षमा करे और अपने सुझाव भेजे.
  धन्यवाद.
Satvichar.com की तरफ से सभी वाचको को विजयादशमी ( दशहरा ) की हार्दिक शुभकामनाए.

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