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Tuesday, 1 October 2019

Untold story of ramayana2

  मै बहोत दिन से अपने blog पर कोई पोष्ट लिख नही पाया.मेरा काम का problem था. लेकीन मै सत विचार और अच्छे विचार लोगो तक पहूंचाना चाहता हू. इसलिए मैने अपने blog का नाम satvichar.com रखा है.
  एक बहोत ही दिलचस्प किस्सा मै आपको बताना चाहता हूं.आजकल की लाईफ बहोत फास्ट है,और मोबाईल की वजह से तो लाईफ बहोत बिझी भी है. थोडे दिन पहले हमारे महाराष्ट्र मे श्रावण का महिना चल रहा है जो की मराठी लोगों के लिए बहोत ही पवित्र माना जाता है. इस महिने मे बहोत सारे त्योहार आते है नागपंचमी जिस दिन नाग कि पूजा कि जाती है,राखी का त्योहार भी इसी महिने में आता है,गोपालकाला या श्रीकृष्ण जन्मोत्सव,गणेशपूजा आदि बहोत सारे त्योहार इसी माह मे आते है.

  पुराणे जमाने और शायद आज भी देहाती गाव मे इस महीने में मंदिरो मे और घरों मे पूजापाठ और भजन किर्तन बडे जोरों से किया जाता है. इस महिने में खेती का बुआई का काम पूरा होता है लोग थोडे रिलॅक्स होते है और रात को खाना खाने के बाद भजन किर्तन और हरीपाठ रामायण  सून ने मंदिरों मे या जिधर भी वो चालू है वहा जाते है.
  मै भी बहोत बार गया हूं और देखा भी हूं ओर अनूभव भी कर चूका हूं कि लोग थोडी देर मे सो जाते है. उधर  रामायण हरीपाठ चालू रहते है और लोग सो जाते है.मै हमेशा सोचता था कि लोग बडे चाहत से रामयण और आदि ग्रंथों कि कथा सूनने आते है फिर उन्हें निंद क्यो आती है. आप लोग मार्क किजीए कभी भी जहा सच मे भगवत भक्ती चल रही होती है वहा निंद आलस्य आ जाता है. वही हम टी.व्ही पर मूव्ही देख रहे है या फिर मोबाईल पर गेम खेल रहे होते है तो हमे कभी निंद नही आती.
   इक दिन कही जाते वक्त बस मे मेरी मुलाकात इक बुजूर्ग से हुई. वेशभूषा से इकदम ऑफिसर लगते थे लेकिन उनकी बातों से पता चलता था कि वो अध्यात्म का गहरा ज्ञान रखते थे.तो मैने भी भजन किर्तन और ग्रंथ सूनते वक्त आनेवाली निंद की बात उन से छेड दी. फिर उन्होंने मुझे रामायण की वो कहानी सुनाई की मै आश्चर्यचकित रह गया. वो इस प्रकार थी.
  ये उत्तर रामायण की कथा है. रावणवध कर के श्रीराम आयोध्या लौटे थे और राजा भी बन चूके थे. सारी प्रजा सुखी थी. इक दिन श्रीराम रात को सोने जा रहे थे उन्होंने निद्रादेवी आवाहन किया.निद्रादेवी श्रीरामजी पहूंची की उन के मन में विचार आया की चलो अब अपने सारे कार्य पूरे हो चूंके है जिसके लिए हमने ये जनम लिया. अब हमे हमारा अवतारकार्य खत्म कर देना चाहिए. उधर उनके मन का यह विचार हनुमानजी जान गये. क्यों कि भगवान ही भक्त होता है और भक्त ही भगवान होता है अगर भक्ती उतनी सच्ची हो तो. हनुमान जी वायूवेग से श्रीराम के पास पहूंच गये. और उन्होंने श्रीराम से पूच्छा की,'हे प्रभू आप अपना अवतार कार्य समाप्त करने वाले हो. तो हमे आप के दर्शन कैसे हो पायेंगे.' तब श्रीराम ने कहा,' हे भक्त शिरोमणी हनुमान मै अपना अवतार कार्य जरूर समाप्त कर रहा हूं लेकिन कलयूग मे जहा भी मेरा नामगुण भक्ती से गाया जायेगा मै वही वही सबको दर्शन दुंगा.'
ये सुनकर हनुमान वहा से चले गये. लेकिन वहा खडी निद्रादेवी ये सब सुन रही थी. उसने भी प्रभू श्रीराम से कहा की,'हे प्रभू मै भी आपके अवतारकार्य खतम होने के बाद आपके दर्शन करना चाहूंगी तब श्रीराम ने कहा,' ठीक है. जहा भी मेरा नामगुण लिया जायेगा वहा के लोगो के ध्यान से मै पलभर भी ओझल हो गया तब तुम उसके मन पर अपना अधिकार जताकर मेरा दर्शन कर पाओगी.' इसलिए देखिए जहा भी सच्ची भगवत भक्ती चल रही है या कोई ग्रंथ पठण हो रहा हो वहाॅ इन्सान को निंद आलस्य आ ही जाता है.
   

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