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Thursday, 25 October 2018

क्या #MeToo को रोका जा सकता है? जी हाँ रोका जा सकता है.

     आज कल social media पर #MeToo
की चर्चा बहोत हो रही है. कुछ लोगो के ये मान-मर्यादा, इज्जत और करीअर का सवाल है, तो कुछ लोगो के लिए ये मज्जाक का विषय है. whats up  पर बहोत सारे जोक भी आते है. लेकीन ये विषय बहोत गंभीर है. अगर हम अपना आत्मपरीक्षण ठीक से करले तो शायद ही कोई हो, जो आज की तारीख मे या तो हैरेसमेंट करनेवाला या तो सहनेवाला न हो.


Can we stop #metoo
                             
  
     इस में इक बात अच्छी है की आज की नारी स्वतंत्र और निडर है. अपने विचार प्रकट करने के लिए उसे किसी के सहारे की जरूरत नही. ये स्त्री-पुरूष समानतायुक्त समाज के निर्माण का संकेत है.
     आज तक नारी ने बहोत कुछ सहा है. एक जमाने मे अगर किसी स्त्री की कोई मांग हो या कोई सलाह हो तो वह सबसे पहले अपनी माॅ से कहती, माॅ उस के पिताजी से कहती फिर बडे ही विचार विमर्श के बाद या तो उसकी मांग स्विकार कर ली जाती या फिर ठुकराई जाती चाहे वो मांग वो सलाह कितनी भी जायज क्यों ना हो. फिर हैरसमेंट जैसी बात तो वो कहने से रही. लेकीन आज का ये जो बदलाव आया है वो प्रशंसनिय है.
     आज बडे बडे नामी लोंगो के नाम इस में लिए जा रहे है इस लिए सारी दुनिया की media मे ये विषय व्हायरल है. नामी लोंगो के नाम आते ही media का भागना स्वभाविक है. लेकीन जो लोग सामान्य है क्या वो हैरसमेंट करते नही या सहते नही?. उन तक कब पहुचेंगी media?. चलो मान लिया #MeToo campaign  जोर से चला और media सामान्य लोंगो तक पहूंच गई तो इतने सारे  cases  चलाने मे कितनी दिक्कत होगी.
      चलो मान लिया #MeToo campaign में बहोत सारे लोगो को सजा मिल गयी. तो ये हैरेसमेंट थोडा कम तो होगा, लेकीन खतम नही होगा, और इसकी भी कोई guarantee नही है, की me too campaign का कोई गलत इस्तेमाल नही कर रहा है.  हो सकता है पुरूष निर्दोश हो और कोई स्त्रि ही उसका शोसन कर रही हो. कल को तो  सब पुरूष इक हो के male me too campaign भी चला सकते है. फिर तो सिर्फ argument होगा,  इसका solution नही निकलेगा. हम यह सब बात करके यहा किसीका इंसाफ नही कर सकते. उसके लिए हमारी न्याय व्यवस्था बहोत सक्षम है और हमारा उस पर विश्वास भी है.
     आज सच में आत्मपरीक्षण की बहोत जरूरत है. हम अपने पिछली पोष्ट विजयदशमि (विजय अपने आप पे) मे विकारों के बारें लिख चूके है. किसी भी इंसान को सजा करने से उसके अंदर के विकारों को सजा नही दी जा सकती. हमारे रोज के व्यवहार मे सत्-विचार,सत्-आचार और सत्-कर्म की बहोत आवश्यक्ता है. हर इंसान को  इसके दायरे मे  रहना ही चाहिए. तो शायद  me too जैसे  campaign  कभी शुरू ही ना हो.
     #MeToo campaign की जड ही है 'काम' विकार जो की अष्टविकारों में सबसे पहले आता है और सब से बलशालि विकार है. ये ना उम्र देखता है,नाही रिश्ते नाते. हम तो फिर भी इंसान है, इसने देवों और बडे बडे ऋषियों मुनियों को भी नही बक्षा.
    इसको कोई भी हो जाती,देश या भाषा  से  फर्क नही पडता. हिंदी मे कहेंगे,'मै आप से प्यार करता हूं'. मराठी मे बोलेंगे,'मी तुमच्यावर प्रेम करतो.' गुजराती में बोलेंगे,' मै तने प्रेम करे छू'. बंगाली में बोलेंगे,'आमी तुमा के भालो बाशी ". पंजाबी में बोलेंगे,"मै तन्ने  प्यार करना."और बाहर के देशों में कहेगे,'I love you'.लेकिन इसका प्रकोप सभी पे समान पड़ता है.
     प्यार,प्रेम गलत नही है. भगवान ने स्त्री और पुरूष के बिच प्यार इसलिए बनाया ताकी एकत्रित परिवार और समाज व्यवस्था बनी रहे. प्रजनन हेतू काम विकार निर्माण किया गया. हम अग्नि, ब्राम्हण और रिश्तेदारों को साक्षी मानकर जिसके साथ विवाह बंधन मे बँध जाते है, वही पति-पत्नी  इसके हकदार है. लेकीन लोगो ने इसका (कामविकार का ) गलत उपयोग किया. सच्चा प्यार भगवान से बढकर है. इक सच्चा प्यार किसी भी इंसान की जिंदगी बदल सकता है, उसे ज़मीन से आसमान बना सकता है. लेकीन काम विकारयुक्त प्यार, सच्चे प्यार को बदनाम कर देता है.
    सिर्फ इक दिन हम अपने आजू बाजू की परिस्थिती का निरीक्षण करे. दो लोग office में काम कर रहे होते है, तो उनकी वार्तालाप यही होती है की,'यार बाॅस की नई सेक्रेटरी क्या आयटम है.' जब दो-चार लोग पार्टी कर रहे होते है तो एक दुसरे से पूछते है,' यार कोई नया नंबर है क्या ?' या फिर 'यार मार्केट मे कोई नया माल आया है क्या'.जब की वो सब शादीशुदा और बाल बच्चेवाले पढे-लिखे लोग होते है.
     हम बडे सहज भाव से ये विचार बोल देते है,कर लेते है लेकिन हमे अंदाजा भी नही होता की ये विचार आगे हमे किस भयानक दुष्कर्म की अंधेरी  खाई मे ले जा रहा है. विकार अकेले नही आते. काम के साथ क्रोध, चिंता डर लालच आदी दुसरे  विकार भी आते है, ये इक दुसरे से संलग्न होते है. फिर हत्या जैसे बडे गुनाह भी होते है. इंसान का अपने मन पर काबू नही रहता, वो क्या करता है उसे समज मे नही आता और जब समज आता है तब तक बहोत देर हो जाती है. सब कुछ हात से निकल जाता है. तब पश्चाताप के सिवा और किए हुए गुनाह की सजा पाने के सिवा उसके  हात मे कुछ नही रह पाता.
     इन विकारों पर हम जितनी भी बात करे, समय और शब्द कम पड जायेंगे. हम भगवान श्रीराम,श्रीकृष्ण तथा रामायण, महाभारत के बारे में सब जानते है. उन के उपदेश को भी जानते है. लेकीन कितने लोग है,जो अपने रोज के व्यवहारों मे उनका अनुकरण करते है, उन के विचारों पे चलते है. हम रोज भजन,किर्तन और प्रवचन सुनते है, सिर्फ सुनते है उन्हे आत्मसात (आत्मसाथ - अंतर आत्मा के साथ) नही करते. भारत देश के भूमी मे बडे बडे महात्मे, ज्ञानी पंडीत और संत लोगों ने जन्म लिया और सत्-विचारों का खजाना छोड गये. जिसमे एक विचार मोती  ये है की, पराई स्त्री माँ समान होती है.  लेकिन हम भौतिक और क्षणिक  सुख की लालच मे इतने अंधे हो गए है की इस खजाने की तरफ किसी का ध्यान ही नही जाता. 
     ये अष्टविकार ही है, जो #MeToo जैसे घ्रृणास्पद कृत्य की जड है. हम अपने रोज के व्यवहार मे सत्-विचार, सत्-कर्म, और सत्-आचरण अपना ले तो किसी को भी #MeToo जैसे campaign चलाने की नौबत नही आएगी और किसी को भी  शर्मिंदा नही होना पड़ेगा.